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Thursday, 9 March 2017

पांडव नृत्य उत्तराखंड

पंडो खेला पांसो :

उत्तराखण्ड राज्य पूरे भारतवर्ष में देवभूमि के नाम से जाना जाता है। बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री एवं यमनोत्री के दर्शन करने हजारो यात्री हर साल चारो  धामों के कपाट खुलते ही देवभूमि चले आते हैं। और देवभूमि के विहगम्य दृष्यों पर मोहित होकर हर साल उत्तराखण्ड आने का मन बना लेते हैं।
उत्तराखण्ड में इन चारों धामों के अलावा भी बहुत से मंदिर हैं, जिनकी अपनी एक एतिहासिक और खास पहचान है एवं उत्तराखण्ड में तमाम लोकनृत्यों का भण्डार है। गढ़वाल क्षेत्र में होने वाला खास लोकनृत्य पाण्डव नृत्य है। पाण्डव नृत्य के बारे में हम सब के मन में तमाम सवालों को जानने की उत्सुकता सामने आती है। कि आखिर पाण्डव नृत्य क्या होता है? और पाण्डव नृत्य का गढ़वाल की भूमि से क्या संबध है? और पाण्डव नृत्य में किस प्रकार का नृत्य होता है?

पाण्डव नृत्य के बारे में प्रचलित मान्यताएॅ हैं कि महाभारत के युद्ध समाप्त होने के बाद, पाण्डवों को वेदव्यास मुनी ने कहा कि तुमसे इस युद्ध मंे बहुत से पाप हो गए हैं। जैसे कुल हत्या, गौत्र हत्या, ब्रहम हत्या क्योंकि पाण्डव और कौरव एक ही कुल के थे। और इन पापों से मुक्ती पाने के लिए पाण्डवों को भगवान शिव की शरण में भेजा। और कहा कि शिव भगवान ही तुम्हें पापों से मुक्ती दिला पाएगें। भगवान शिव की खोज में पॅाच्चों पाण्डव कैलाश पर्वत की ओर चल पड़ते हैं।
भगवान शिव पाण्डवों को उनके द्वारा किए गए पापों से मुक्ति नहीं देना चाहते थे। इस लिए भगवान शिव पाण्डवों से बचने के लिए केदारनाथ चले जाते हैं। पाण्डव भगवान शिव की खोज में केदारनाथ आते हैं। और शिव भगवान केदारनाथ में पाण्डव से बचने के लिए महिष का रूप धारण कर लेते हैं। लेकिन भीम शिव भगवान को महिष के रूप में पहचान लेता है और जैसे ही महिष के पास जाता है भगवान शिव खुद को महिष के रूप में धरती में समा लेते हैं। केदार का अर्थ दलदल भूमि भी होता है।
पौराणिक मान्यता है कि केदानाथ में धरती में समाविष्ट होकर भगवान शिव का सिर पशुपतिनाथ नेपाल में प्रकट हुआ। जबकी शरीर के अन्य भाग जैसे- नाभी मद्दमहेश्वर में, भुजाएॅ तुंगनाथ में, पृष्ठ भाग केदारनाथ में, जटा कल्पनाथ में एवं मुख रूद्रनाथ में प्रकट हुए। उत्तराखण्ड में ये पाचों तीर्थ – केदारनाथ, कल्पनाथ, रूद्रनाथ, तुंगनाथ एवं मद्दमहेश्वर पच्च केदार के नाम से जाने जाते हैं।
मान्यता है कि पाण्डवों ने केदारनाथ में  शिव भगवान के पृष्ठ भाग की पूजा अर्चना की और एतिहासिक केदारनाथ मंदिर का निर्माण किया। और इसी तरह पूजा अर्चना करके शिव भगवान के अन्य भागों की पूजा अर्चना करके मंदिरों का निर्माण किया।
इसके बाद पाण्डव और द्रौपदी मोक्ष प्राप्ती के लिए स्वर्गारोहनी के लिए निकल पड़तें हैं। स्वर्गारोहनी बद्रीनाथ धाम से आगे है। स्वार्गारोहनी जाते हुए द्रौपदी ने भीम पुल नामक स्थान पर प्राण त्याग देती है। नकुल ने लक्ष्मीवन नामक स्थान पर एवं सहदेव ने सहस्त्रधारा नामक स्थान पर प्राण त्याग दिए। इसके बाद चलते चलते अर्जुन ने चक्रतीर्थ में और भीम ने संतोपंथ में अपने प्राण त्याग दिए। केवल युधिष्ठर स्वर्गारोहनी पहुंचते हैं। युधिष्ठर के साथ कहतें हैं कि एक स्वांग भी होता है। स्वर्ग से पुष्पक विमान में एक दूत आता है। और युधिष्ठिर स्वर्ग चले जाते हैं।
पाण्डवों ने इस अंतिम यात्रा के बाद, विशेष रूप से गढ़वाल क्षेत्र के लोगों पर आलोकिक शक्तियों का प्रभाव फैला दिया। और इस प्रभाव के कारण यहाॅ के जनमानस पर अवतरित होने लगे। और गढ़वाल के जनमानस ने पाण्डवों के आलोकिक प्रेम मानकर पाण्डव नृत्य शुरू कर दिया।
आज भी पाण्डव नृत्य का प्रभाव प्रत्यक्ष रूप से यहॉ विधामान है जो पाण्डवों के गढ़वाल क्षेत्र से विशेष प्रेम को प्रदर्शित करता है। पाण्डव नृत्य का विश्लेषण करने के लिए रूद्रप्रयाग जिले के तल्लानागपुर क्षेत्र के बोरा गांव का अघ्ययन किया कि आखिर पाण्डव नृत्य का आयोजन किस प्रकार होता है। लगभग हजार के आसपास इस गांव की आबादी है। और आस पास के गावों में भी पाण्डव नृत्य का आयोजन होता है। पाण्डव नृत्य का आयोजन नवंबर और दिसंबर के मध्य किया जाता है।
अर्थात यह पुरे एक माह का आयोजन है। गढ़वाल क्षेत्र में नवंम्बर और दिसंबर के समय खेती का काम पुरा हो चुका होता है। और गांव वाल इस खाली समय में पाण्डव नृत्य के आयोजन के लिए बड़चड़कर भागीदारी निभाते हैं। पाण्डव नृत्य कराने के पीछे गांव वालों द्वारा विभिन्न तर्क दिए जाते हैं। जिनमें मुख्य रूप से गांव में खुशहाली, अच्छी फसल और माना जाता है कि गाय में होने वाला खुरपा रोग पाण्डव नृत्य कराने के बाद ठीक हो जाता है।
और इस आयोजन के दौरान गढ़वाल में भौगोलिक दृष्टि से दूर दूर रहने वाली पहाड़ की बहू बेटिया अपने घर आती हैं और अपने सुख दुख बताने का अवसर मिल जाता है। अर्थात पाण्डव नृत्य पहाड़वासियों से एक गहरा संबध भी रखता है। पाण्डव नृत्य में बहुत से रोचक तथ्य सम्मलित हैं। पाण्डव नृत्य के आयोजन में सर्वप्रथम गांव वालों द्वारा पंचायत बुलाकर आयोजन की रूपरेखा तैयार की जाती है। सभी गांव वाले तय की गई तिथि के दिन पाण्डवा चैक में एकत्रित होते हैंै।
पाण्डवां चैक उस स्थान को कहा जाता है जहां पर पाण्डव नृत्य का आयोजन होता है। ढोल एवं दमाऊ जो कि उत्तराखण्ड के पारंपरिक वाघ्य यंत्र हैं। और इन वाघ्य यंत्रो में आलोकिक शक्तियां निहित होती हैं। इन दो वाध्य यंत्रों द्वारा पाण्डव नृत्य में जो पाण्डव बनते है उनको विशेष थाप द्वारा अवतरित किया जाता है।
और इन पाण्डवों को पाण्डव पश्वा कहा जाता है। पाण्डव पश्वों के अवतरित होने के पीछे एक अनोखा रहस्य है जिस पर तमाम शैाध कार्य किए जा सकते हैं। खैर पाण्डव पश्वा गांव वालों द्वारा तय नहीं किए जाते हैं। एक विशेष थाप पर विशेष पाण्डव अवतरित होते हैं। अर्थात युधिष्ठिर पश्वा के अवतरित होने की एक विशेष थाप है। वैसे ही भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव की अपनी अपनी विशेष थाप होती है। बोरा गांव के जानकार लौग यह भी बताते हैं कि पाण्डव पश्वा उन्हीं लौगों पर आते है जिनके परिवार में यह पहले भी अवतरित होते आएं हों
बोरा गांव के नवयुवक हरीष गुसाई जो कि पाण्डव नृत्य में अर्जुन पश्वा बने थे, जो कि पाण्डव नृत्य में मुख्य पश्वा होता है। अपने अनुभव बताते हुए कहते हैं कि में पाण्डव नृत्य में पश्वा नहीं बनना चाहता था। लेकिन जैसे ही अर्जुन पश्वा की विशेष थाप बजी मेरे शरीर में कंपन होने लगा और मुझ पर अर्जुन पश्वा अवतरित हो गया। तब से में पाण्डव नृत्य में गहरा विश्वास रखता हूं। तमाम तैयारियों के बाद पाण्डव नृत्य का आयोजन शुुरू कर दिया जाता है। जिसमें तमाम अद्भुत आयोजन सम्मलित हैं।
इन आयोजनों में पाण्डव पश्वों के बाण निकालने का दिन, धार्मिक स्नान, मौरू डाली, माल्लाफुलारी, चक्रव्यूह, कमलव्यूह, गरूड़व्यूह, गैण्डो कौथीक आदि समलित हैं। पाण्डव नृत्य में  कुल 13 पश्वा होते हैं। इनमें द्रौपदी, नारायण भगवान, युधिष्ठिर एवं भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव, हनूमान, अग्निबाण, मालाफुलारी, भवरिक, कल्याल्वार। इन सबका अपना अपना अहम योगदान रहता है।
सभी गांव वालों का अटूट विश्वास रहता है कि पाण्डव नृत्य से गंाव में खुशहाली, अच्छी फसल, एवं गांव में सुख समृद्धी होती है। प्रत्येक समाज की अपनी एक परंपरा होती है एवं कुछ मान्यताएं जिसे वह समाज अपनी धरोहर मानता है। और पाण्डव नृत्य उत्तराखण्ड की धरोहर है। और आज के दौर में इंसान भौतिक सुख के साथ आध्यात्मिक सुख भी चाहता है। और पाण्डव नृत्य में भौतिक एवं आध्यात्मिक दोनो सुख निहित हैं।

पाण्डव नृत्य पर डॉ0 विलियम एस0 सैक्स की किताब डांसिंग विद सेल्फ में पाण्डव नृत्य के हर पहलू को बड़े ही रोचक तरीके से बताया गया है। आप सब एक बार गढ़वाल में होने वाले पाण्डव नृत्य को देखने जरूर आएं। पाण्डव नृत्य का हर आयोजन बढा़ ही रोचक, बेहतरीन एवं आकर्षक होता है।     
 सांस्कृतिक  धरोहर  उत्तराखंड 
 खेल पांसो गढ़वाली गीत -:

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