अपणी संस्कृति अपणी पछ्याण......!!!

Monday, 15 May 2017

रैंसमवेयर वायरस - Cyber attack 2017


रैंसमवेयर वायरस पर आरबीआई का अलर्ट

आरबीआई ने रैंसमवेयर वायरस पर बैंकों को सावधानी बरतने की अपील की है


रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने वायरस अटैक पर बैंकों को चेतावनी जारी की है. आरबीआई ने बैंकों को अलर्ट करते हुए कहा है कि रैंसमवेयर वायरस का अटैक एटीम पर हो सकता है. इसलिए बैंकों को सचेत रहना चाहिए.
आरबीआई ने रैंसमवेयर वायरस पर बैंकों को सावधानी बरतने की अपील की है. रैंसमवेयर वायरस अटैक अब तक का सबसे बड़ा वायरस हमला है. अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी (एनएसए) से चोरी किए गए ‘साइबर हथियारों’ का इस्तेमाल कर भारत समेत लगभग 100 देशों पर बड़े पैमाने पर साइबर हमले किए गए.
अमेरिका के मीडिया संस्थानों ने कहा कि सबसे पहले स्वीडन, ब्रिटेन और फ्रांस से साइबर हमले की खबर मिली. सुरक्षा सॉफ्टवेयर कंपनी ‘अवास्ट’ के अनुसार इस गतिविधि में शुक्रवार को बढ़ोतरी देखी गई थी.
एक कंप्यूटर मालवेयर के जरिए हमला करने वालों ने लोगों के कंप्यूटर सिस्टम को लॉक कर दिया और उसके बाद उसे खोलने के लिए फिरौती की मांग की. साइबर अटैकर्स ने बिटकॉइन्स में 300 डॉलर की फिरौती की मांग की. फ्रांस, रूस, ब्रिटेन, स्वीडन, रूस सहित दुनिया के कई देश इससे प्रभावित हुए.क्या होता है रैनसमवेयर साइबर अटैक
आमतौर पर कई मालवेयर, जिन्हें हम अक्सर वायरस कहते हैं, आपके कंप्यूटर में गलत तरीके से घुस जाते हैं. अक्सर इनका उद्देश्य या तो आपके कंप्यूटर के डाटा को चुराना होता है या फिर उसे मिटाना. लेकिन रैनसमवेयर आपके सिस्टम में आकर आपके डाटा को 'इनक्रिप्ट' यानी लॉक कर देता है. यूजर तब तक इसमें मौजूद डेटा तक नहीं पहुंच पाता जब तक कि वह इसे ‘अनलॉक' करने के लिए रैनसम यानी फिरौती नहीं देता. ये मालवेयर ईमेल के जरिए फैलता है.
इस तरह के साइबर अटैक से आप अपने पीसी/लैपटॉप में सेव फाइलों, तस्वीरों और अन्य दस्तावेजों से हाथ धो सकते हैं। ऐसे में आपको ये कदम जल्द से जल्द उठाने चाहिए-
तुरंत लें अपनी फाइलों का बैकअप
बिना देर किए अपनी सभी फाइलों का एक अलग सिस्टम में बैकअप ले लें। इसके लिए सबसे बेहतर एक एक्सटर्नल हार्ड ड्राइव रहेगी जो इंटरनेट से जुड़ी न हो। ऐसे में अगर आप साइबर अटैक का शिकार होते भी हैं, तब भी आपकी सारी इन्फर्मेशन आपके पास सुरक्षित रहेगी और हैकर्स फिरौती वसूलने के लिए उसका फायदा नहीं उठा पाएंगे।
संदिग्ध ईमेल्स, वेबसाइट्स और ऐप्स से सावधान
रैंसमवेयर के कम करने के लिए यह जरूरी होता है कि हैकर्स के शिकार बनाए जाने वाले सिस्टम में उस खतरनाक सॉफ्टवेयर को डाउननोड करें। इसी के जरिए बाद में अटैक किया जाता है। फर्जी ईमेल्स, वेबसाइट्स पर दिखने वाले संदिग्ध एड्स और अनवेरिफाइड ऐप्स का इस्तेमाल करके ही इन सॉफ्टवेयर्स को सिस्टम में इंस्टॉल किया जाता है। ऐसे में हमेशा सावधान रहें और गैरजरूरी ईमेल्स और वेबसाइट्स को खोलने से बचें। ऐसे ऐप को कभी इंस्टॉल न करें जिन्हें ऑफिशल स्टोर द्वारा वेरिफाई न किया गया हो। साथ ही कोई भी प्रोग्राम इंस्टॉल करने के पहले उसका रिव्यू जरूर पढ़ें।
एंटीवाइरस का इस्तेमाल करें
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Tuesday, 28 March 2017

जाने हिन्दू नववर्ष के बारें में


हिंदु नववर्ष यानि गुड़ी-पड़वा 



हिंदी पंचांग के अनुसार मौसम के बदलाव के साथ ही हिंदु नववर्ष का आरंभ होता है जिसे गुड़ी-पड़वा के नाम से जाना जाता है। हिंदु पंचांग के अनुसार चैत्र माह में सर्दियों को अलविदा कहते हुये और वसंत ऋतु के सुहावने मौसम के साथ नये साल का स्वागत किया जाता है। इस दिन सूर्य की उपासना की जाती है क्योकि सूर्य को सृष्टि के सुचारु रुप से चलाने की दिशा में महत्तवपूर्ण स्त्रोत माना गया है। मंदिरों में, घरों में और आफिसों में साफ-सफाई के बाद पूजा करने के पश्चात कार्य आरंभ किया जाता है। इस दिन विशेष रुप से धार्मिक पाठ भी कराये जाते है और प्रसाद बांटा जाता है। पूजा में गर्मी के फलों को ईश्वर को अर्घ्य के रुप में चढ़ाया जाता है। गुड़ी पड़वा के दिन से गर्म पानी से नहाना बंद कर दिया जाता है और आने वाले दिनों में शीतल जल का ही प्रयोग किया जाता है। एक तरह से गुड़ी-पड़वा सर्दियों को विदाई देते हुये सुहावने मौसम और प्रकृति के स्वागत का दिन है जिसे हम सभी गुड़ी-पर्वा के तौर पर मनाते हैं।


पंचांग 2074 विक्रम संवत - Click Here



नववर्ष और नवरात्रि का शुभ संगम

चैत्र मास से हमारा नववर्ष आरंभ होता है और नवरात्रि भी इसी माह में आते है जिन्हें चैत्र नवरात्र भी कहा जाता है। वैसे तो, नवरात्र पर्व साल में दो बार आते है पहला आश्विन मास में और दूसरा चैत्र मास में। और सबसे विशेष बात ये है कि इन दोनों ही महीनों में मौसम में परिवर्तन होता है यानि सर्दी और गर्मी का संगम का समय होता है। अश्विन मास में जहां सर्दियों का आगमन होता है, वही चैत्र महीने में गर्मियों की शुरुआत होती है और नये साल की शुरुआत भी। मौसम के बदलाव के साथ ही पूरे वातावरण में बदलाव होता है और इसके साथ ही हमारे शरीर में भी बदलाव होता है। मौसम के इन्ही बदलावों से शरीर को बचाने के लिये नवरात्र के नौ दिनों का व्रत रखा जाता है जिससे शरीर स्वस्थ रहें। नवरात्रि यानि मां दुर्गा की नौ दिनों तक उपासना करना, जिन्हें शक्ति प्रदान करने वाली देवी भी माना गया है अर्थात मौसम के बदलाव के साथ ही उपासना के माध्यम से देवी से नये साल को हर्षोल्लास के साथ मनाने के लिये शक्ति का प्रसाद मांगते हैं।

शास्त्रों व शिलालेखों में उल्लेख

'विक्रम संवत' के उद्भव एवं प्रयोग के विषय में कुछ कहना कठिन है। यही बात 'शक संवत' के विषय में भी है। किसी विक्रमादित्य राजा के विषय में, जो ई. पू. 57 में था, सन्देह प्रकट किए गए हैं। इस संवत का आरम्भ गुजरात में कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से (नवम्बर, ई. पू. 58) और उत्तरी भारत में चैत्र कृष्ण प्रतिपदा (अप्रैल, ई. पू. 58) से माना जाता है। बीता हुआ विक्रम वर्ष ईस्वी सन+57 के बराबर है। कुछ आरम्भिक शिलालेखों में ये वर्ष कृत के नाम से आये हैं[1]

विद्वान मतभेद

विक्रम संवत के प्रारम्भ के विषय में भी विद्वानों में मतभेद हैं। कुछ लोग ईसवी सन 78 और कुछ लोग ईसवी सन 544 में इसका प्रारम्भ मानते हैं। फ़ारसी ग्रंथ 'कलितौ दिमनः' में पंचतंत्र का एक पद्य 'शशिदिवाकर योर्ग्रहपीडनम्श' का भाव उद्धृत है। विद्वानों ने सामान्यतः 'कृत संवत' को 'विक्रम संवत' का पूर्ववर्ती माना है। किन्तु 'कृत' शब्द के प्रयोग की व्याख्या सन्तोषजनक नहीं की जा सकी है। कुछ शिलालेखों में मावल-गण का संवत उल्लिखित है, जैसे- नरवर्मा का मन्दसौर शिलालेख। 'कृत' एवं 'मालव' संवत एक ही कहे गए हैं, क्योंकि दोनों पूर्वी राजस्थान एवं पश्चिमी मालवा में प्रयोग में लाये गये हैं। कृत के 282 एवं 295 वर्ष तो मिलते हैं, किन्तु मालव संवत के इतने प्राचीन शिलालेख नहीं मिलते। यह भी सम्भव है कि कृत नाम पुराना है और जब मालवों ने उसे अपना लिया तो वह 'मालव-गणाम्नात' या 'मालव-गण-स्थिति' के नाम से पुकारा जाने लगा। किन्तु यह कहा जा सकता है कि यदि कृत एवं मालव दोनों बाद में आने वाले विक्रम संवत की ओर ही संकेत करते हैं, तो दोनों एक साथ ही लगभग एक सौ वर्षों तक प्रयोग में आते रहे, क्योंकि हमें 480 कृत वर्ष एवं 461 मालव वर्ष प्राप्त होते हैं।
यह मानना कठिन है कि कृत संवत का प्रयोग कृतयुग के आरम्भ से हुआ। यह सम्भव है कि 'कृत' का वही अर्थ है जो 'सिद्ध' का है, जैसे- 'कृतान्त' का अर्थ है 'सिद्धान्त' और यह संकेत करता है कि यह कुछ लोगों की सहमति से प्रतिष्ठापित हुआ है। 8वीं एवं 9वीं शती से विक्रम संवत का नाम विशिष्ट रूप से मिलता है। संस्कृत के ज्योति:शास्त्रीय ग्रंथों में यह शक संवत से भिन्नता प्रदर्शित करने के लिए यह सामान्यतः केवल संवत नाम से प्रयोग किया गया है। 'चालुक्य विक्रमादित्य षष्ठ' के 'वेडरावे शिलालेख' से पता चलता है कि राजा ने शक संवत के स्थान पर 'चालुक्य विक्रम संवत' चलाया, जिसका प्रथम वर्ष था - 1076-77 ई.।

नव संवत्सर

'विक्रम संवत 2074' का शुभारम्भ 28 मार्च, सन 2017 को चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से है। पुराणों के अनुसार चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा को ब्रह्मा ने सृष्टि निर्माण किया था, इसलिए इस पावन तिथि को नव संवत्सर पर्व के रूप में भी मनाया जाता है। संवत्सर-चक्र के अनुसार सूर्य इस ऋतु में अपने राशि-चक्र की प्रथम राशि मेष में प्रवेश करता है। भारतवर्ष में वसंत ऋतु के अवसर पर नूतन वर्ष का आरम्भ मानना इसलिए भी हर्षोल्लासपूर्ण है, क्योंकि इस ऋतु में चारों ओर हरियाली रहती है तथा नवीन पत्र-पुष्पों द्वारा प्रकृति का नव शृंगार किया जाता है। लोग नववर्ष का स्वागत करने के लिए अपने घर-द्वार सजाते हैं तथा नवीन वस्त्राभूषण धारण करके ज्योतिषाचार्य द्वारा नूतन वर्ष का संवत्सर फल सुनते हैं।
शास्त्रीय मान्यता के अनुसार चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि के दिन प्रात: काल स्नान आदि के द्वारा शुद्ध होकर हाथ में गंध, अक्षत, पुष्प और जल लेकर ओम भूर्भुव: स्व: संवत्सर- अधिपति आवाहयामि पूजयामि च इस मंत्र से नव संवत्सर की पूजा करनी चाहिए तथा नववर्ष के अशुभ फलों के निवारण हेतु ब्रह्मा जी से प्रार्थना करनी चाहिए कि 'हे भगवन! आपकी कृपा से मेरा यह वर्ष कल्याणकारी हो और इस संवत्सर के मध्य में आने वाले सभी अनिष्ट और विघ्न शांत हो जाएं।' नव संवत्सर के दिन नीम के कोमल पत्तों और ऋतुकाल के पुष्पों का चूर्ण बनाकर उसमें काली मिर्चनमक, हींग, जीरा, मिश्री, इमली और अजवायन मिलाकर खाने से रक्त विकार आदि शारीरिक रोग शांत रहते हैं और पूरे वर्ष स्वास्थ्य ठीक रहता है।

राष्ट्रीय संवत

हिन्दू नर्व वर्ष

भारतवर्ष में इस समय देशी विदेशी मूल के अनेक संवतों का प्रचलन है, किंतु भारत के सांस्कृतिक इतिहास की दृष्टि से सर्वाधिक लोकप्रिय राष्ट्रीय संवत यदि कोई है तो वह 'विक्रम संवत' ही है। आज से लगभग 2,068 वर्ष यानी 57 ईसा पूर्व में भारतवर्ष के प्रतापी राजा विक्रमादित्य ने देशवासियों को शकों के अत्याचारी शासन से मुक्त किया था। उसी विजय की स्मृति में चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि से विक्रम संवत का भी आरम्भ हुआ था।

नये संवत की शुरुआत

प्राचीन काल में नया संवत चलाने से पहले विजयी राजा को अपने राज्य में रहने वाले सभी लोगों को ऋण-मुक्त करना आवश्यक होता था। राजा विक्रमादित्य ने भी इसी परम्परा का पालन करते हुए अपने राज्य में रहने वाले सभी नागरिकों का राज्यकोष से कर्ज़ चुकाया और उसके बाद चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से मालवगण के नाम से नया संवत चलाया। भारतीय कालगणना के अनुसार वसंत ऋतु और चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि अति प्राचीन काल से सृष्टि प्रक्रिया की भी पुण्य तिथि रही है। वसंत ऋतु में आने वाले वासंतिक 'नवरात्र' का प्रारम्भ भी सदा इसी पुण्य तिथि से होता है। विक्रमादित्य ने भारत की इन तमाम कालगणनापरक सांस्कृतिक परम्पराओं को ध्यान में रखते हुए ही चैत्र शुक्ल प्रतिपदा की तिथि से ही अपने नवसंवत्सर संवत को चलाने की परम्परा शुरू की थी और तभी से समूचा भारत इस पुण्य तिथि का प्रतिवर्ष अभिवंदन करता है।
दरअसल, भारतीय परम्परा में चक्रवर्ती राजा विक्रमादित्य शौर्य, पराक्रम तथा प्रजाहितैषी कार्यों के लिए प्रसिद्ध माने जाते हैं। उन्होंने 95 शक राजाओं को पराजित करके भारत को विदेशी राजाओं की दासता से मुक्त किया था। राजा विक्रमादित्य के पास एक ऐसी शक्तिशाली विशाल सेना थी, जिससे विदेशी आक्रमणकारी सदा भयभीत रहते थे। ज्ञान-विज्ञान, साहित्यकला संस्कृति को विक्रमादित्य ने विशेष प्रोत्साहन दिया था। धंवंतरि जैसे महान वैद्य, वराहमिहिर जैसे महान ज्योतिषी और कालिदास जैसे महान साहित्यकार विक्रमादित्य की राज्यसभा के नवरत्नों में शोभा पाते थे। प्रजावत्सल नीतियों के फलस्वरूप ही विक्रमादित्य ने अपने राज्यकोष से धन देकर दीन दु:खियों को साहूकारों के कर्ज़ से मुक्त किया था। एक चक्रवर्ती सम्राट होने के बाद भी विक्रमादित्य राजसी ऐश्वर्य भोग को त्यागकर भूमि पर शयन करते थे। वे अपने सुख के लिए राज्यकोष से धन नहीं लेते थे।

राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान

पिछले दो हज़ार वर्षों में अनेक देशी और विदेशी राजाओं ने अपनी साम्राज्यवादी आकांक्षाओं की तुष्टि करने तथा इस देश को राजनीतिक द्दष्टि से पराधीन बनाने के प्रयोजन से अनेक संवतों को चलाया किंतु भारत राष्ट्र की सांस्कृतिक पहचान केवल विक्रमी संवत के साथ ही जुड़ी रही। अंग्रेज़ी शिक्षा-दीक्षा और पश्चिमी संस्कृति के प्रभाव के कारण आज भले ही सर्वत्र ईस्वी संवत का बोलबाला हो और भारतीय तिथि-मासों की काल गणना से लोग अनभिज्ञ होते जा रहे हों परंतु वास्तविकता यह भी है कि देश के सांस्कृतिक पर्व-उत्सव तथा रामकृष्णबुद्धमहावीरगुरु नानक आदि महापुरुषों की जयंतियाँ आज भी भारतीय काल गणना के हिसाब से ही मनाई जाती हैं, ईस्वी संवत के अनुसार नहीं। विवाह-मुण्डन का शुभ मुहूर्त हो या श्राद्ध-तर्पण आदि सामाजिक कार्यों का अनुष्ठान, ये सब भारतीय पंचांग पद्धति के अनुसार ही किया जाता है, ईस्वी सन् की तिथियों के अनुसार नहीं।

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Wednesday, 22 March 2017

नया कैबिनेट उत्तराखंड

कैबिनेट मंत्री-
सतपाल महाराज- मुख्यमंत्री की रेस में रहे सतपाल महाराज को सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण, लघु सिंचाई,वर्षा जल संग्रहण,जलागम प्रबंधन,भारत-नेपाल उत्तराखंड नदी परियोजनाएं,पर्यटन ,तीर्थाटन एवं धार्मिक मेले और संस्कृति मंत्रालय
प्रकाश पंत- संसदीय कार्य, विधायी, भाषा,वित्त,आबकारी,पेयजल एवं स्वच्छता, गन्ना विकास एवं चीनी उद्योग
हरक सिंह रावत- वन विभाग, अपशिष्ट निवारण,श्रम सेवावायोजन,प्रशिक्षण एवं आयुष शिक्षा
मदन कौशिक- शहरी विकास, आवास,राजीव गांधी शहरी आवास,जनगणना,पुनगर्ठन और निर्वाचन
यशपाल आर्य- परिवहन, समाज कल्याण, अल्पसंख्यक कल्याण, छात्र कल्याण, ग्रामीण तालाब विकास, सीमान्त क्षेत्र विकास, परिक्षेत्र विकास एवं प्रबंधन एवं पिछड़ा क्षेत्र विकास
अरविन्द पांडे- विद्यालयी शिक्षा, प्रौढ़ शिक्षा, संस्कृति शिक्षा, खेल, युवा कल्याण एवं पंचायजती राज
सुबोध उनियाल- कृषि, कृषि विपणन, कृषि प्रसंस्करण,कृषि शिक्षा,उद्यान एवं फलोत्पादन एवं रेशम उद्योग
राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार)
रेखा आर्य- महिला कल्याण एवं बाल विकास, पशुपालन, भेड़ एवं बकरी पालन, चारा एवं चारागाह विकास और मत्स्य विभाग
एन सिंह रावत- सहकारिता, उच्च शिक्षा एवं दुग्ध विकास

इसके अलावा गृह, गोपन, कार्मिक, सतर्कता, विधि एवं न्याय, सचिवालय प्रशासन के साथ अन्य  महत्वपूर्ण मंत्रालय मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने अपने पास रखा है। 

भारत का केन्द्रीय मंत्रिमण्डल


भारतीय लोकसभा - सदस्य (545 )
                                       (543 + 2 nominated  )
भारत सरकार  कैबिनेट मंत्री - क्लिक करें 
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Friday, 17 March 2017

उत्तराखंड विधानसभा परिणाम बूथ वाइज


बूथ वाइज - परिणाम



Uttarakhand State General Assembly Elections 2017 - AC-Wise Detailed Result (Form-20)
DistrictAssembly Constituency
 NumberName
Uttarkashi1 Purola(SC)
2 Yamunotri
3 Gangotri
Chamoli4 Badrinath
5 Tharali (SC)
6 Karnprayag
Rudraprayag7 Kedarnath
8 Rudraprayag
Tehri Garhwal9 Ghanshali(SC)
10 Deoprayag
11 Narendranagar
12 Pratapnagar
13 Tehri
14 Dhanolti
Dehradun15 Chakrata(ST)
16 Vikasnagar
17 Sahaspur
18 Dharampur
19 Raipur
20 Rajpur Road(SC)
21 Dehradun Cantt
22 Mussoorie
23 Doiwala
24 Rishikesh
Haridwar25 Hardwar
26 B.H.E.L. Ranipur
27 Jwalapur (SC)
28 Bhagwanpur(SC)
29 Jhabrera (SC)
30 Pirankaliyar
31 Roorkee
32 Khanpur
33 Manglore
34 Laksar
35 Hardwar Rural
Pauri Garhwal36 Yamkeshwar
37 Pauri (SC)
38 Srinagar
39 Chaubattakhal
40 Lansdowne
41 Kotdwar
Pithoragarh42 Dharchula
43 Didihat
44 Pithoragarh
45 Gangolihat(SC)
Bageshwar46 Kapkote
47 Bageshwar(SC)
Almora48 Dwarahat
49 Sult
50 Ranikhet
51 Someshwar(SC)
52 Almora
53 Jageshwar
Champawat54 Lohaghat
55 Champawat
Nainital56 Lalkuwa
57 Bhimtal
58 Nainital(SC)
59 Haldwani
60 Kaladhungi
61 Ramnagar
Udham Singh Nagar62 Jaspur
63 Kashipur
64 Bajpur(SC)
65 Gadarpur
66 Rudrapur
67 Kichha
68 Sitarganj
69 Nanak matta(ST)
70 Khatima

Tuesday, 14 March 2017

उत्तराखंड की सांस्कृतिक धरोहर फूलदेई का त्यौहार

 आप सभी मित्रो को फूलदेई की शुभकामनाये -:

 
 फूलों का पर्व फूलदेई-हर रंग में एक आस है, विश्वास और अहसास है। हर पर्व में संस्कृति है, सुरूचि और सौंदर्य है। ये पर्व न सिर्फ कलात्मक अभिव्यक्ति के परिचायक हैं, अपितु इनमें गुंथी हैं, सांस्कृतिक परंपराएं, महानतम संदेश और उच्चतम आदर्शों की भव्य स्मृतियां। इन सबके केंद्र में सुव्यक्त होती है - शक्ति। उस दिव्य शक्ति के बिना किसी त्योहार, किसी पर्व, किसी रंग और किसी उमंग की कल्पना संभव नहीं है। एक मौसम विदा होता है और सुंदर सुकोमल फूलों की वादियों के बीच खुल जाती है श्रृंखला त्योहारों की। श्रृंखला जो बिखेरती है चारों तरफ खुशियों के खूब सारे खिलते-खिलखिलाते रंग। हमारी यशस्वी संस्कृति स्त्री को कई आकर्षक संबोधन देती है। स्नेह, सरलता और पवित्रता की दृष्टि से कुँवारी कन्याएँ साक्षात शक्ति स्वरूपा हैं। अन्य पूजन और अनुष्ठानों में ब्रम्हभोज की प्रधानता बताई गई है, लेकिन नवरात्रि में शक्ति की उपासना के दौरान अनुष्ठानों की पूर्णता के लिए कन्या पूजन की प्राथमिता बताई गई है। मां कल्याणी है, वहीं पत्नी गृहलक्ष्मी है। बिटिया राजनंदिनी है और नवेली बहू के कुंकुम चरण ऐश्वर्य लक्ष्मी आगमन का प्रतीक है। हर रूप में वह आराध्या है

इसी क्रम में चैत्र मास की संक्रान्ति को फूलदेई के रुप में मनाया जाता है, जो बसन्त ऋतु के स्वागत का त्यौहार है। इस दिन छोटे बच्चे सुबह ही उठकर जंगलों की ओर चले जाते हैं और वहां से प्योली/फ्यूंली, बुरांस, बासिंग आदि जंगली फूलो के अलावा आडू, खुबानी, पुलम के फूलों को चुनकर लाते हैं और एक थाली या रिंगाल की टोकरी में चावल, हरे पत्ते, नारियल और इन फूलों को सजाकर हर घर की देहरी पर लोकगीतों को गाते हुये जाते हैं और देहरी का पूजन करते हुये गाते हैं-
फूल देई, छम्मा देई,
देणी द्वार, भर भकार,फूल देई, छम्मा देई,
ये देली स बारम्बार नमस्कार,
फूले द्वार……फूल देई-छ्म्मा देई।
इस दिन से लोकगीतों के गायन का अंदाज भी बदल जाता है, होली के फाग की खुमारी में डूबे लोग इस दिन से ऋतुरैंण और चैती गायन में डूबने लगते हैं। ढोल-दमाऊ बजाने वाले लोग जिन्हें बाजगी, औली या ढोली कहा जाता है। वे भी इस दिन गांव के हर घर के आंगन में आकर इन गीतों को गाते हैं। जिसके फलस्वरुप घर के मुखिया द्वारा उनको चावल, आटा या अन्य कोई अनाज और दक्षिणा देकर विदा किया जाता है। बसन्त के आगमन से जहां पूरा पहाड़ बुरांस की लालिमा और गांव आडू, खुबानी के गुलाबी-सफेद रंगो से भर जाता है। वहीं चैत्र संक्रान्ति के दिन बच्चों द्वारा प्रकृति को इस अप्रतिम उपहार सौंपने के लिये धन्यवाद अदा करते हैं। इस दिन घरों में विशेष रुप से सई* बनाकर आपस में बांटा जाता है।

मुझे याद आता है कि बचपन में हम इस दिन का बेसब्री से इंतजार करते थे, चूंकि सड़्क के किनारे कस्बे में रहने की वजह से मैं जंगल नहीं जा पाता था, लेकिन आस-पास से प्योंली के फूल, भिटोरे के फूल (गेहूं के खेत में उगने वाला एक सफेद रंग का फूल, जिसमें लाल धारियां बनी होती हैं) और सरसों, आडू, पुलम, खुबानी के फूलों को एक थाली में सजाकर अपने घर के आस-पास के घरों में घूमा करते थे। जिस घर की देहरी हम पूजते, वहां से २० पैसे का एक सिक्का (पीतल वाला), गुड़, चावल और सई खाने को मिलता था। गढ़वाल मण्डल में इस त्यौहार में बच्चों के अलावा
पूरे परिवार के लोग शामिल रहते हैं। इस दिन गांव के लोग अपने घर में बोये गये हरेले की टोकरियों को गांव के चौक पर इकट्ठा करके उसकी सामूहिक पूजा करते हैं और हरेले के तिनके सभी परिवारों  उसके बाद नौले पर जाकर उनको विसर्जित कर दिया जाता है। इस प्रकार से बसन्त ऋतु के आगमन को हर्षोल्लास के साथ उत्तराखण्ड में मनाया जाता है। इस प्रकार से प्रकृति को धन्यवाद कहने के साथ  प्रकृति के इन रंगों (फूलों के रुप में) को अपनी देहरी पर सजाकर उत्तराखण्ड प्रकृति का अभिवादन करता है।

(*सई- यह उत्तराखण्ड का एक लोक व्यंजन है, इसे चावल के आटे से बनाया जाता है। चावल के आटे को दही में गूंथा जाता है। उसे घी में काफी देर तक भूना जाता है, जब यह भुनकर भूरा होने लगे तो इसमें स्वादानुसार चीनी मिला दी जाती है।)
 त्यौहार  मनाने का कारण 
कहते हैं कि एक राजकुमारी का विवाह दूर काले पहाड़ के पार होता है, जहां उसे अपने मायके की याद सताती रहती है। वह सास से मायके भेजने की प्रार्थना करती है किन्तु सास उसे जाने नहीं देती है। मायके की याद में तड़पती फ्योंली एक दिन मर जाती है। फ्योंली को उसके मायके के पास दफना दिया जाता है, जिस स्थान पर कुछ दिनों बाद पीले रंग का एक सुंदर फूल खिलता है।

इस फूल को फ्योंली नाम दे दिया जाता है और उसकी याद में पहाड़ में फूलों का त्यौहार मनाया जाता है। फूलदेई बच्चों को प्रकृति प्रेम और सामाजिक चिंतन की शिक्षा बचपन में ही देने का आध्यात्मिक पर्व है।